दो स्वरों के मिलने पर होने वाला परिवर्तन: छह स्वरसन्धियाँ (दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण्, अयादि, पूर्वरूप), उनके सूत्र, सन्धि और सन्धि-विच्छेद।
Key ideas
सन्धि का प्रकार केवल मिलने वाले दो स्वरों से तय होता है: पहले पद का अन्तिम स्वर और दूसरे पद का पहला स्वर।
दीर्घ (अकः सवर्णे दीर्घः): समान स्वर, ह्रस्व हो या दीर्घ, मिलकर उसी का दीर्घ बनते हैं: विद्या + आलयः = विद्यालयः, अति + इव = अतीव, सु + उक्तिः = सूक्तिः।
गुण (आद्गुणः): अ/आ के बाद इ/ई हो तो ए, उ/ऊ हो तो ओ, ऋ हो तो अर्: स्व + इच्छा = स्वेच्छा, सूर्य + उदयः = सूर्योदयः, ग्रीष्म + ऋतुः = ग्रीष्मर्तुः।
वृद्धि (वृद्धिरेचि): अ/आ के बाद ए/ऐ हो तो ऐ, ओ/औ हो तो औ: सदा + एव = सदैव, वन + औषधिः = वनौषधिः।
यण् (इको यणचि): इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद असमान स्वर हो तो वे य्, व्, र् बनते हैं: इति + आदि = इत्यादि, सु + आगतम् = स्वागतम्, पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा।
अयादि (एचोऽयवायावः): ए, ऐ, ओ, औ के बाद स्वर हो तो वे अय्, आय्, अव्, आव् बनते हैं: ने + अनम् = नयनम्, गै + अकः = गायकः, पो + अनः = पवनः, नौ + इकः = नाविकः।
पूर्वरूप (एङः पदान्तादति): पद के अन्त के ए/ओ के बाद अ आए तो अ का लोप होकर ऽ (अवग्रह) लिखा जाता है: वने + अपि = वनेऽपि।
Remember
दीर्घ
अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ
गुण
अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्
वृद्धि
अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ
यण् (बाद में असमान स्वर)
इ/ई → य्; उ/ऊ → व्; ऋ → र्
अयादि (बाद में स्वर)
ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्
पूर्वरूप
पद के अन्त का ए/ओ + अ = एऽ/ओऽ (ग्रामे + अपि = ग्रामेऽपि)
Watch out
ए + अ में देखें कि ए कहाँ है: पद के अन्त में हो तो पूर्वरूप (वनेऽपि), धातु के अन्त में हो तो अयादि (ने + अनम् = नयनम्)।
गुण और वृद्धि को उलटना: अ + उ = ओ (गुण), पर अ + ओ = औ (वृद्धि)।
यण् में य्, व्, र् आधे (हल्) होते हैं: इति + आदि = इत्यादि, ‘इतियादि’ नहीं।
पूर्वरूप में अवग्रह छोड़ देना: वनेऽपि लिखें, ‘वनेपि’ नहीं।